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झूठ बोल रहे हैं भागवत, इतिहास गवाह है RSS जो बोलता है वह करता नहीं है

Pro. Hemantkumar Shah Pro. Hemantkumar Shah | 1h ago · 4 min read
झूठ बोल रहे हैं भागवत, इतिहास गवाह है RSS जो बोलता है वह करता नहीं है

RSS जो बोलता है वह करता नहीं है और जो करता है वह बोलता नहीं है।

RSS के सर संघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में अमेरिका में न्यूयोर्क में एक परिषद में बहुत ही समझदारी भरी बातें की हैं। उन्होंने कहा है कि, “जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से भगा दिया जाना चाहिए, वह हिंदू नहीं रह सकता।” सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने के संदर्भ में मोहन भागवत ने इस तरह की तरह-तरह की बातें वहां की हैं।

लेकिन RSS का तो हाथी के दांत जैसा है, दिखाने के अलग हैं और खाने-चबाने के अलग हैं। यह बात जवाहरलाल नेहरू के दिमाग में बिल्कुल पक्की बैठी हुई थी। नेहरू मानते थे कि,

RSS हमेशा जो बोलता है वह करता नहीं है और जो करता है वह बोलता नहीं है। मतलब कि संघ की कथनी और करनी में हमेशा बहुत अंतर रहता है।

इस संदर्भ में नेहरू के कुछ प्रसंग महत्त्वपूर्ण हैं:

(1) 1948 में 27 सितंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय से RSS के दूसरे सर संघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर को लिखे गए पत्र में उन्हें यह जानकारी दी गई कि नेहरू ऐसा नहीं मानते कि RSS नुकसानदेह संस्था नहीं है। यह तब की बात है कि महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात् संघ पर प्रतिबन्ध लगाया था और गोलवलकर इसे हटाये जाने के लिए जी-जान से प्रयास कर रहे थे. इस पत्र में लिखा गया था कि,

RSS का तथा उसकी गतिविधियों का दृष्टिकोण निश्चित रूप से सांप्रदायिक है। RSS के नेता जो अक्सर बोलते हैं, वह जो कुछ किया जाता है उससे अलग होता है; और वास्तविक व्यवहार तथा दिए जाने वाले उपदेश, इन दोनों के बीच भारी अंतर होता है।”

(2) यही बात नेहरू ने दूसरी बार भी कही थी। नेहरू ने 27 अक्टूबर 1948 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था और उसमें उन्होंने महात्मा गांधी का उल्लेख किया था और गांधी ने संघ के बारे में जो कहा था इस का जिक्र किया था। RSS के स्वरूप और विचार के बारे में नेहरू के ये अवलोकन सरदार पटेल के लिए कोई नए नहीं थे।

लेकिन नेहरू ने उस पत्र में सरदार से यह भी कहा कि,

महात्मा गांधी ने “गोलवलकर के खिलाफ अपना सख्त मत व्यक्त किया था और कहा था कि उनके शब्दों पर विश्वास करना संभव नहीं है।” इस का मतलब यह साफ था कि सरदार पटेल संघ पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त करने के लिए जो प्रयास कर रहे थे इसमें गोलवलकर जो कहे इस पर विश्वास न रखा जाए।

(3) 1948 में नवंबर महीने में जवाहरलाल नेहरू विदेश गए हुए थे। वहां से वापस आने के बाद आठ नवंबर को संघ के सरसंघचालक गोलवलकर ने नेहरू से मिलने के लिए पत्र लिखा था। इसमें गोलवलकरने विनती की थी कि वे मिलने के लिए समय दे। नेहरू ने दस नवंबर को उन्हें जबाबी पत्र लिखकर उनसे मिलने से मना कर दिया। इसी पत्र में नेहरु ने लिखा था कि,

“RSS के घोषित लक्ष्यों का वास्तविक बातों के साथ तथा उन गतिविधियों के साथ शायद ही कोई लेना-देना है जो RSS से जुड़े लोगों द्वारा विभिन्न रूपों और तरीकों से की जाती हैं। ये वास्तविक लक्ष्य भारत की संसद के फैसलों और भारत के प्रस्तावित संविधान के प्रावधानों के पूरी तरह से खिलाफ प्रतीत होते हैं। हमें मिली जानकारी के मुताबिक संघ की गतिविधियां राष्ट्र-विरोधी और अक्सर विनाशकारी स्वरूप की तथा हिंसक हैं। इसलिए आप यह स्वीकार करेंगे कि केवल शब्दों से कोई मकसद पूरा नहीं होगा।” मतलब यह हुआ कि गोलवलकर बोल तो बहुत अच्छा लेते थे लेकिन संघ का बर्ताव बिलकुल इस के विपरीत रहता था।

(4) सरदार पटेल नेहरू के मंत्रिमंडल में गृह मंत्री थे। उन्होंने ही संघ पर प्रतिबंध लगाया था। बाद में वे ही इस प्रतिबंध को हटाने के प्रयास कर रहे थे। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे इस के लालायित भी थे। नेहरू भी बाद में लोकतंत्र में ऐसे प्रतिबन्ध ठीक नहीं होते ऐसा मानते हुए इससे सहमत हुए। लेकिन वे RSS को लेकर आशंकित तो थे ही। उन्होंने तीन फरवरी, 1949 को प्रान्तों के मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में लिखा था कि,

“यह याद रखा जाना चाहिए कि RSS एक ऐसा संगठन है जो हमेशा बोलता कुछ है और करता कुछ है।”

अब नेहरु के इन सारे शब्दों को मद्देनजर रखते हुए संघ, संघ के प्रचारक रहे नरेन्द्र मोदी की सरकार और बीजेपी की राज्य सरकारों के बर्ताव के साथ और मोहन भागवत के अभी के बयान की तुलना करेंगे तो आसानी से लग सकता है कि नेहरू सच्चे थे।

Pro. Hemantkumar Shah

Pro. Hemantkumar Shah

प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।