जंतर-मंतर आंदोलन पर पुलिसिया दमन के पर्दा बने अखबार?
देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर जंतर-मंतर आंदोलन पर पुलिसिया दमन में घायल हुए छात्रों की आवाज सिरे से गायब दिखीं।
देश के अधिकांश समाचार पत्रों को मोदियाबिंद हो गया है। टीवी न्यूज चैनलों के लिए वैकल्पिक मीडिया ने एक शब्द इजाद किया है – गोदी मीडिया। हालांकि इसमें समाचार पत्र भी शामिल हैं। कारपोरेट न्यूज चैनल की तरह सरकार भक्ति में अब समाचार पत्र भी पीछे नहीं रहना चाहता। आंखों के सामने जो घटित हो उसे कैसे छिपाया जा सकता है, लेकिन कारपोरेट मीडिया इस सच को गायब कर देती है और उस पर पाकिस्तान और चीन एंगल का मिर्च-मसाला लगा देती है। आंखों की एक बीमारी होती है मोतियाबिंद। लेकिन देश की पापुलर मीडिया को मोदियाबिंद हो गया है। मतलब कारपोरेट मीडिया मोदी और शाह की नजरों से खबरों को देखते हैं और परोसते हैं।
दिल्ली पुलिस ने संसद मार्च के दौरान जिस बर्बरता से छात्रों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल किए। लेकिन एक दिन बाद, मंगलवार को देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर दिल्ली पुलिस की इस दमनकारी कार्रवाई में घायल हुए छात्रों और प्रदर्शनकारियों की आवाज़ें सिरे से गायब दिखीं।
अधिकांश बड़े हिंदी और अंग्रेज़ी अखबारों ने अपनी पहले पन्ने कवरेज में सोमवार को शांतिपूर्ण संसद मार्च की कोशिश कर रहे छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और उसके बाद सेंट्रल दिल्ली के विभिन्न इलाकों में फैले घटनाक्रम पर फोकस किया। हालांकि, द इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें घायल प्रदर्शनकारियों के बयान शामिल थे। लेकिन हिंदी के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक जागरण, अमर उजाला और नवभारत टाइम्स ने इस सच को सिरे से गायब कर दिया।

दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर 'शांतिपूर्ण संसद मार्च में उत्पात, दिल्ली बंधक' शीर्षक हेडिंग से लीड खबर प्रकाशित की है। इस हेडिंग में छात्रों को उत्पाती बताया गया है। इतना ही नहीं प्रदर्शनकारी छात्रों को अराजक बताते हुए उनपर दिल्ली को बंधक बनाने का आरोप लगाया गया है। दैनिक जागरण ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि प्रदर्शन के कारण राजधानी दिल्ली का बड़ा हिस्सा प्रभावित रहा। अखबार ने पुलिस के दावों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों पर पथराव किया, एक इमारत के भीतर से पुलिस पर पत्थर फेंके और एक सरकारी कार्यालय में तोड़फोड़ की।

कमाल की बात है कि दैनिक भास्कर ने लाज बचाते हुए छात्रों का पक्ष लिया है। दैनिक भास्कर ने इस प्रदर्शन को "पिछले 14 वर्षों में संसद की ओर हुआ सबसे बड़ा प्रदर्शन" बताया। अखबार ने इसकी तुलना वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों से की।

बता दें कि पिछले कई दिनों से हजारों की संख्या में छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और कुप्रबंधन को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे। सोमवार को संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ प्रदर्शनकारियों ने संसद तक मार्च निकालने की योजना बनाई थी। पुलिस ने मार्च को रोकने की कोशिश की, लेकिन कुछ प्रदर्शनकारी संसद के निकट तक पहुंचने और सेंट्रल दिल्ली के अन्य हिस्सों कनाट प्लेस में एकत्र होने में सफल रहे।
कई प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया। एक प्रदर्शनकारी ने दावा किया कि पुलिस ने पहले उन्हें बैठने के लिए कहा और उसके बाद लाठीचार्ज शुरू कर दिया। एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि सुरक्षा बलों के हस्तक्षेप तक प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था।
मंगलवार के संस्करण में द इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर शीर्षक दिया— "प्रदर्शनकारी दिल्ली के बीचों-बीच पहुंचे, मार्च रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया।" अखबार ने यह भी प्रमुखता से बताया कि कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों ने सोमवार को अपनी मांगों का ज्ञापन केंद्रीय मंत्री और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को सौंपा। घटनाक्रम से परिचित सूत्रों के हवाले से अखबार ने लिखा कि सरकार की ओर से प्रतिनिधिमंडल को कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया गया।
नड्डा से मुलाकात करने वाले अभियान के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने बाद में हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि यह बैठक "बेनतीजा रही।"
रांका ने कहा,
"सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। अगली बार हम तब तक बातचीत नहीं करेंगे, जब तक वे स्वयं प्रदर्शन स्थल पर नहीं आते। यदि वे हमारे समय का सम्मान नहीं करते, तो हम भी उनके समय का सम्मान नहीं करेंगे।"
हालांकि, मंगलवार को प्रकाशित अधिकांश प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर रांका के इस बयान को प्रमुखता नहीं दी गई।
हिंदुस्तान टाइम्स ने अपने पहले पन्ने के ऊपरी हिस्से में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प, एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के भूख हड़ताल जारी रखने के ऐलान और जे.पी. नड्डा तथा कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों की बैठक को प्रमुखता दी।
द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया कि पुलिस कार्रवाई में "कई" लोग घायल हुए। अखबार के अनुसार, 38 घायलों को लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और 65 लोगों को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया।
वहीं, पुलिस का दावा है कि झड़प के दौरान 60 प्रदर्शनकारी और 118 सुरक्षाकर्मी घायल हुए।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने अन्य प्रमुख अंग्रेज़ी अखबारों की तुलना में इस घटनाक्रम को अपेक्षाकृत कम स्थान दिया। उसकी प्रमुख खबर में कहा गया कि पुलिस ने संसद मार्च को रोक दिया, जबकि जे.पी. नड्डा ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों से मुलाकात की।