Iran-US War: क्या पश्चिम एशिया एक नए शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रहा है?
अमरीका-ईरान के हालिया टकराव का मतलब क्या है?
पश्चिम एशिया में पिछले कुछ दिनों की घटनाएँ केवल सैन्य कार्रवाई की श्रृंखला नहीं हैं। वे इस बात का संकेत भी हैं कि क्षेत्र का शक्ति-संतुलन बदल रहा है। यह लग रहा था कि सैन्य टकराव के बाद अंततः बातचीत ही समाधान का रास्ता बनेगी। लेकिन हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि अब कूटनीति और सैन्य दबाव साथ-साथ चल रहे हैं, और फिलहाल किसी भी पक्ष के पीछे हटने के संकेत नहीं दिखाई देते।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण केवल ईरान और अमेरिका के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा का भी प्रश्न है। इसी वजह से यहाँ होने वाली हर सैन्य या राजनीतिक हलचल का असर तेल बाज़ार से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक दिखाई देता है।
हाल के घटनाक्रमों से यह संकेत मिलता है कि ईरान अब अपनी रणनीतिक स्थिति को पहले की तुलना में अधिक मज़बूत मान रहा है। इसीलिए वह किसी ऐसे समझौते की ओर बढ़ने को तैयार नहीं दिखता जिसे वह अपने लिए नुकसानदेह समझे। दूसरी ओर अमेरिका भी क्षेत्र में अपनी सैन्य और राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखने के लिए दबाव की नीति अपनाता दिखाई देता है। नतीजा यह है कि दोनों पक्ष बातचीत की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं कर रहे हैं और सैन्य तैयारी भी लगातार जारी रखे हुए हैं।
हॉर्मुज को लेकर दोनों पक्ष मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैन्डिंग की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं, जहाँ अमरीका का मानना है कि इसके तहत समुद्री रास्ता पूरी तरह पहले की स्थिति में आ जाना चाहिए, वहीं ईरान समझौते की अपने नियंत्रण की तरह व्याख्या कर रहा है।
इस टकराव का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका वैचारिक पक्ष भी है। हाल में मोजतबा खामेनेई के संदेश में कर्बला और इमाम हुसैन की शहादत का उल्लेख किया गया। यह केवल धार्मिक संदर्भ नहीं है। इसका उद्देश्य संघर्ष को नैतिक और ऐतिहासिक वैधता प्रदान करना भी है। जब किसी युद्ध को केवल सीमाओं या सुरक्षा का प्रश्न न बताकर न्याय और अन्याय के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब उसके राजनीतिक अर्थ बदल जाते हैं। ऐसे में समझौते की गुंजाइश भी सीमित होती चली जाती है, क्योंकि पीछे हटना केवल रणनीतिक नहीं बल्कि वैचारिक पराजय के रूप में देखा जाने लगता है। अपने पिता की मौत के बदले का उनका संदेश ईरान की अवाम के एक हिस्से के विचारों को आवाज़ देता है। दूसरी ओर बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया गया है। इस तरह एक ऐसी रणनीति उभरती दिखाई देती है जिसमें बातचीत की संभावना भी बनी रहती है और सैन्य जवाब देने की तैयारी भी।
उधर ट्रम्प एक हारी हुई जंग को जीत में बदलने के लिए बेताब दिखाई दे रहा है। जो मैदान में नहीं मिला उसे समझौते में हासिल करने की यह कोशिश ईरान में कामयाब होती नहीं दिख रही। सैनिक ठिकानों के बाद अब नागरिक ठिकानों को निशाना बनाने की उसकी रणनीति असल में अमरीकी प्रशासन की कुंठा को दिखाती है।
दूसरी ओर ईरान की सैन्य रणनीति का केंद्र अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बताया गया है। कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया। इस रणनीति का संदेश यह है कि संघर्ष इन देशों की जनता से नहीं बल्कि उनकी भूमि पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ढाँचे से है।
ओमान का उल्लेख विशेष महत्व रखता है। लंबे समय से ओमान पश्चिम एशिया में संवाद और मध्यस्थता की भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में वहाँ स्थित किसी अमेरिकी सैन्य सुविधा को निशाना बनाए जाने का संकेत केवल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी माना जा सकता है। यह अन्य खाड़ी देशों के लिए भी एक चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है कि यदि उनकी भूमि का उपयोग अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए होता है, तो वे स्वयं भी संघर्ष की चपेट में आ सकते हैं।
इस पूरे संकट का सबसे तत्काल असर वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर दिखाई देता है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का अर्थ है कि तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ेगी। यही कारण है कि हर नई सैन्य कार्रवाई के साथ कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा।
फिलहाल जो तस्वीर उभरती है, वह यह नहीं बताती कि कोई पक्ष तत्काल पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध चाहता है। इसके बजाय दोनों पक्ष ऐसी रणनीति अपनाते दिखाई देते हैं जिसमें समय-समय पर सीमित सैन्य कार्रवाई, जवाबी हमले और राजनीतिक संदेशों के ज़रिए दबाव बनाए रखा जाए। इसे नियंत्रित तनाव की स्थिति कहा जा सकता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि लंबे समय तक चलने वाला नियंत्रित तनाव अक्सर किसी एक अप्रत्याशित घटना के कारण अचानक व्यापक युद्ध में बदल जाता है।
यही इस पूरे संकट की सबसे बड़ी चुनौती है। पश्चिम एशिया आज केवल दो देशों के बीच टकराव का गवाह नहीं है। यहाँ ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन, वैचारिक राजनीति, सैन्य रणनीति और वैश्विक कूटनीति एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह संघर्ष सीमित दायरे में बना रहता है या किसी ऐसी दिशा में बढ़ता है जहाँ से लौटना किसी भी पक्ष के लिए आसान नहीं होगा।