सुप्रीम कोर्ट के अंदर ही वकीलों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध! फिर भी कोर्ट मौन!
सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के अधिकार का उल्लंघन सुप्रीम कोर्ट में ही हो रहा है, फिर भी दोनों न्यायाधीश शांत हैं।
सर्वोच्च अदालत ने आज रविवार 11 अक्टूबर को सर्वोच्च अदालत के ही अनेक वकीलों द्वारा अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के संबंध में जो याचिका दायर की गयी थी, उस पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन कुछ आदेश दिए हैं। सर्वोच्च अदालत ने पहले नौ तारीख को यह कहा था कि 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों के संदर्भ में पुलिस द्वारा और सरकार द्वारा कोई बाधा उत्पन्न न की जाए। और फिर भी ट्रेनें, मेट्रो ट्रेन, बसें आदि बंद कर दी गईं और इस तरह सरकार ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया, इसलिए यह याचिका दायर की गई थी।
अब इस याचिका के विषय में सर्वोच्च अदालत ने जो कुछ 11 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा है, वह अजीब लगता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जो आदेश दिया गया है, उसमें जो लिखा गया है वह तो घोड़ा भाग जाने के बाद अश्वशाला को ताला लगाने जैसा है। यह मामला न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की अदालत नंबर 5 में आज 10 अक्टूबर को चला था।
11 पन्नों का यह आदेश है। कोर्ट के आदेश में यह कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद-19(2) में जो प्रतिबंध हैं, उन प्रतिबंधों के अलावा ट्रेन और मेट्रो ट्रेन चालू रहें। अब संविधान के अनुच्छेद-19(2) में यह कहा गया है कि वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आड़े सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है यदि सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के सामने कोई खतरा लगता हो।
सवाल यह है कि कल जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित होने वाले थे। क्या इससे सार्वजनिक शांति को कोई खतरा था? उसमें सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने वाली नहीं थी। कुछ बिगड़े इससे पहले ही सब लाकडाउन हो गया था। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट उसके बारे में तो कुछ कहती ही नहीं है।
दूसरा, अदालत ने यह कहा कि लोगों की मुक्त आवाजाही (Free Movement) चालू रहे, यह सरकार देखे। अरे, लेकिन कल सरकार ने लोगों की मुक्त आवाजाही ही रोक दी, उसका क्या? सर्वोच्च अदालत उसके बारे में भी कुछ नहीं कहती। अदालत ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवाएं चालू रहनी चाहिए। लेकिन जो कल बंद कर दी गईं, उसका क्या? अदालत उसके बारे में भी कुछ नहीं कहती।
निशस्त्र लोग शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा हों तो उनमें लोगों को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, ऐसा भी अदालत ने कहा। लेकिन कल जो ऐसा हुआ, उसका क्या? अदालत पूरी तरह मौन है।
वकीलों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अंदर और उसके आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-163 लागू कर दी गई होने के बोर्ड लगाए गए थे। यह धारा यह कहती है कि एक से अधिक लोगों के एक ही स्थान पर इकट्ठा होने पर सरकार प्रतिबंध लगा सकती है। अदालत कहती है कि वे बोर्ड हटा लिए जाएं। लेकिन वैसे बोर्ड लगाए गए, उसका क्या? वैसे बोर्ड लगाने वालों को कोई सजा होगी या नहीं? दोनों न्यायाधीश इस बात पर भी मौन हैं।
वकीलों और पत्रकारों को उनका व्यावसायिक काम करने से रोका न जाए, ऐसा भी अदालत ने इस आदेश में कहा। लेकिन दस तारीख को जंतर-मंतर पर और अन्य जगहों पर ऐसा किया गया, उसका क्या? अदालत फिर से मौन है।
हालांकि, अब 13 तारीख को इस याचिका पर आगे की सुनवाई होगी। सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) में लिखे गए वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने में विफल रही है, क्योंकि उस अधिकार का सरकार ने उल्लंघन किया फिर भी सुप्रीम कोर्ट तत्काल कुछ नहीं करती, उसकी नजरों के सामने ही सब कुछ होने के बावजूद।
यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा-163 क्या है? इस धारा के तहत नागरिकों को सुरक्षा देने के नाम पर नागरिकों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाने की सत्ता सरकार को मिलती है। सवाल यह है कि इस सत्ता का दुरुपयोग हुआ है और सुप्रीम कोर्ट अभी कुछ नहीं कर रही है। नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर जो कानून बनाया गया है, उसी के नाम पर नागरिकों के अधिकारों को खत्म किया जा रहा है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के अंदर ही धारा-163 लगाई गई होने के बोर्ड लगाए गए थे। और फिर भी सुप्रीम कोर्ट शांत है और केवल इतना ही कहती है कि वह बोर्ड हटा लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के अधिकार का उल्लंघन सुप्रीम कोर्ट में ही हो रहा है, फिर भी दोनों न्यायाधीश शांत हैं। तत्काल किसी को सजा नहीं होती।
देखिए, सरकारी वकील यह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने नौ तारीख को जो कुछ कहा था, उसका पालन सरकार ने किया ही है और वाणी तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई हमला नहीं किया गया है! तह कितना सरासर जूठ है यह सब जानते हैं. कमाल है! सरकारी वकील तुषार मेहता को पुलिस ने जो कुछ किया है, वह कैसे दिखाई देगा?
सुप्रीम कोर्ट के ये आदेश अब यदि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन होंगे तो इन पर लागू होंगे? अभी तो कुछ कहा नहीं जा सकता। सरकार तानाशाह बन गई है और सुप्रीम कोर्ट उसमें उसका साथ दे रही है, ऐसा ही लगता है।
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।
