14 साल बाद दिल्ली की सड़कों पर दोहराया गया निर्भया कांड, हैवानियत की सारी हदें पार
निर्भया कानून की उड़ी धज्जियां, पर्दे लगी बस 47 किलोमीटर तक दौड़ाते रहे दरिंदे, पुलिस की नजर नहीं पड़ी।
निर्भया कांड के बाद देश में सख्त कानून बने। कानून बदले, सिस्टम बदला, दोषियों को फांसी भी मिली। लेकिन 14 साल बाद फिर वही सवाल। आज भी सुरक्षित नहीं है दिल्ली में ‘निर्भया’। रविवार की रात 16 वर्षीय कक्षा 11 की छात्रा से चलती स्लीपर बस में सामूहिक दुष्कर्म किया गया। पुलिस के मुताबिक, भारी बारिश में फंसी छात्रा मदद मांगने के लिए बस में सवार हुई थी। घटना 4 अगस्त की रात की है। मैनपुरी की किशोरी परिवार से विवाद के बाद घर से निकलकर नोएडा में अपने रिश्तेदार से मिलने जा रही थी।
पुलिस के अनुसार, भारी बारिश और अंधेरे के कारण छात्रा गलती से परी चौक पर उतर गई। इसी दौरान वहां से गुजर रही एक खाली स्लीपर बस को उसने मदद के लिए रुकने का संकेत दिया। बस चालक कुलदीप और परिचालक संदीप ने छात्रा को बताया कि बस नोएडा सेक्टर-63 जा रही है और उसे अंदर बैठा लिया।
पुलिस ने बताया कि.
बस के चलते ही परिचालक ने किशोरी के साथ अश्लील हरकतें शुरू कर दीं। छात्रा का आरोप है कि इसके बाद चालक और परिचालक ने उसके साथ दुष्कर्म किया। विरोध करने पर दोनों ने उसे जान से मारने की धमकी भी दी। बस करीब 47 किलोमीटर का सफर तय करते हुए कश्मीरी गेट की ओर पहुंची। आरोपियों ने देर रात छात्रा को कश्मीरी गेट बस टर्मिनल के पास रिंग रोड पर छोड़ दिया और फरार हो गए। घबराई हुई छात्रा ने कश्मीरी गेट पुलिस से संपर्क कर घटना की जानकारी दी।
पुलिस ने बाद में कुलदीप और संदीप को तिमारपुर स्थित बस पार्किंग से गिरफ्तार कर लिया। स्लीपर बस भी जब्त कर फॉरेंसिक जांच के लिए भेजी गई है।
जांच में सामने आया कि,
बस पहले खराब हो गई थी और मरम्मत के लिए सूरजपुर की एक कार्यशाला में ले जाई गई थी। मरम्मत के बाद चालक और परिचालक खाली बस को तिमारपुर ले जा रहे थे, तभी परी चौक पर उन्हें किशोरी मिली। पुलिस के मुताबिक, बस की बर्थों के चारों ओर पर्दे लगे थे, जिनकी आड़ में आरोपी अपराध को छिपाने में सफल रहे। परी चौक से कश्मीरी गेट के बीच बस ने लगभग 47 किलोमीटर की दूरी तय की, जिसके बाद किशोरी को सड़क किनारे छोड़ दिया गया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 47 किलोमीटर तक बस में एक 16 साल की नाबालिग के साथ बलात्कार होता रहा और यूपी से लेकर दिल्ली तक की पुलिस सोई रही।
जगह-जगह यूपी और दिल्ली पुलिस की बैरिकेडिंग लगी रहती है, पुलिस ने कहीं भी बस को रोक कर चेक करने की जरूरत नहीं समझी। जबकि बस में टिंटेड ग्लास और पर्दे लगे थे। जबकि निर्भया कांड के बाद जो 2012 में निर्भया एक्ट बना है उसमें यह विशेष रूप से कानूनी प्रावधान है किसी भी चार पहिया या बड़े वाहनों में शीशों पर ब्लैक फिल्म, टिंटेड ग्लास और पर्दा लगाना गैरकानूनी है।
किशोरी ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के आईएसबीटी और वहां से तिमारपुर तक सड़क पर घूमती रही, चलती बस में लड़की के साथ दुष्कर्म होता रही। लड़की चीखती चिल्लाती रही लेकिन चौकी पर, बैरिकेडिंग पर कहीं पुलिस नहीं थी। हैरानी की बात ये है कि न दिल्ली की सीमा पर बस की कोई जांच हुई, न ही बस में लगे टिंटेड ग्लास और पर्दों पर पुलिस की निगाह पड़ी। एक घंटे 20 मिनिट तक सड़क पर दुष्कर्म होता रहा और कहीं पुलिस को पता नहीं चला। यह पुलिस, ट्रैफिक और पूरे सिस्टम के खोखलेपन को उजागर करता है। हालांकि घटना के बाद पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन पुलिस के इस इस निकम्मेपन पर कोई कार्रवाई होगी।
निर्भया कांड के बाद बने कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ीं। 2012 के निर्भया कांड और उसके बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों के आधार पर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय और दिल्ली सरकार ने यात्री बसों के लिए कड़े नियम तय किए थे, जिनकी इस मामले में अनदेखी दिखी। सुरक्षा नियम के तहत पर्दे व टिंटेड ग्लास पर रोक है। सुप्रीम कोर्ट और मोटर वाहन नियमों के तहत यात्री बसों में खिड़कियों पर पर्दे लगाने या विजिबिलिटी रोकने पर सख्त पाबंदी है। बस में मोटे पर्दे लगे थे, जिससे अंदर हो रही दरिंदगी बाहर से पूरी तरह छिप गई।
सभी कमर्शियल यात्री वाहनों में लाइव वीएलटीडी और पैनिक बटन अनिवार्य है, जो कट्रोल रूम से जुड़े हों। लेकिन खाली बस चलती रही, लेकिन किसी भी आपातकालीन सिस्टम या कंट्रोल रूम से कोई अलर्ट ट्रिगर नहीं हुआ।
वाणिज्यिक बसों के चालक और परिचालक का पुलिस सत्यापन और उनकी यूनिफॉर्म पर नेमप्लेट अनिवार्य है। लेकिन रात के समय निजी बसें बिना किसी आधिकारिक निगरानी या नियमित रूट लॉग के दौड़ रही थीं।
सार्वजनिक परिवहन और लंबी दूरी की स्लीपर बसों में आंतरिक सुरक्षा के लिए सीसीटीवी लगाना अनिवार्य किया गया था। लेकिन बस के भीतर सुरक्षा निगरानी नदारद थी। पुलिस को केवल बाहरी रास्तों के सीसीटीवी पर निर्भर रहना पड़ा।
चलती स्लीपर बस में 11वीं की छात्रा से दरिंदगी की वारदात ने यह साफ कर दिया है कि 2012 के निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक और निजी यात्री बसों के लिए तय किए गए कड़े सुरक्षा मानक आज भी केवल कागजों तक सीमित हैं। जिस स्लीपर बस में छात्रा से हैवानियत हुई, वह नियमों को ताक पर रखकर खिड़कियों पर पर्दे लटकाए 47 किलोमीटर तक दौड़ती रही, लेकिन रास्ते में न तो किसी पिकेट पर उसकी जांच हुई और न ही आपातकालीन सुरक्षा तंत्र काम आया।
सूत्रों के अनुसार, वारदात में इस्तेमाल स्लीपर बस में तकनीकी खराबी आ गई थी, जिसे ठीक कराने के लिए ड्राइवर कुलदीप और कंडक्टर संदीप उसे ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर स्थित एक वर्कशॉप ले गए थे। बस की मरम्मत के बाद दोनों खाली बस लेकर वापस उत्तरी दिल्ली की तिमारपुर पार्किंग लौट रहे थे।
परी चौक से लेकर कश्मीरी गेट बस अड्डे तक करीब 47 किलोमीटर के सफर के दौरान बस के भीतर खिड़कियों पर भारी पर्दे टंगे थे, जिससे बाहर से अंदर की कोई गतिविधि नहीं दिख सकती थी। इस पूरे रास्ते में बस को कहीं भी पुलिस चेकिंग का सामना नहीं करना पड़ा। पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि पूरा मार्ग एक्सप्रेसवे और रिंग रोड का हिस्सा है, जहां बैरिकेडिंग लगाने से भारी जाम की स्थिति बन जाती है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि नोएडा-दिल्ली बॉर्डर और प्रमुख चौराहों पर तैनात पुलिस बल ने संदिग्ध रूप से रात में दौड़ रही खाली बस पर नजर क्यों नहीं रखी।