'सतलुज' को क्यों ओटीटी से हटाया गया, जानिए इनसाइड स्टोरी
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' हाल के वर्षों में पंजाब की सबसे विवादित फिल्मों में से एक बन गई है। यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। फिल्म की रिलीज़ पहले ही केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ( सीबीएफसी) के साथ लंबे कानूनी विवाद के कारण करीब चार साल तक टली रही। इसका मूल नाम 'Punjab '95' था, जिसे बदलकर 'सतलुज' किया गया। 3 जुलाई को फिल्म ZEE5 पर रिलीज़ हुई, लेकिन करीब 48 घंटे बाद ही प्लेटफॉर्म ने भारत में इसे हटा दिया।
ZEE5 ने "मौजूदा परिस्थितियों" का हवाला दिया, जबकि सरकारी सूत्रों के अनुसार सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण यह कदम उठाया गया। फिल्म हटने के बाद पंजाब के गांवों और गुरुद्वारों में इसकी सामुदायिक स्क्रीनिंग शुरू हो गई, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप पर नई बहस छिड़ गई। शिरोमणि अकाली दल ने पंजाब के हर गांव में स्क्रीनिंग का खर्च उठाने की घोषणा की, जबकि आम आदमी पार्टी के विधायक एवं विधानसभा स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने भी अपने क्षेत्र में सामुदायिक प्रदर्शन कराने की बात कही।
फिल्म कई सालों तक सेंसर बोर्ड के कानूनी पचड़ों में फंसा रहा
फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। खालड़ा ने पंजाब में उग्रवाद के दौरान अवैध अंतिम संस्कार और लोगों के लापता होने के मामलों का दस्तावेजीकरण किया था। बाद में 1995 में उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई। फिल्म कई वर्षों तक रिलीज़ नहीं हो सकी क्योंकि सीबीएफसी ने इसमें कई बड़े बदलाव करने को कहा था। बोर्ड ने केवल फिल्म का नाम ही नहीं, बल्कि जसवंत सिंह खालड़ा का नाम बदलने तक की मांग की थी। लेकिन फिल्म निर्माताओं ने कहानी में बदलाव करने से इनकार कर दिया। इसके बाद फिल्म का मामला कई वर्षों तक सेंसर बोर्ड के साथ कानूनी विवाद में फंसा रहा और इसकी रिलीज़ लगभग चार साल तक टल गई। आखिरकार 3 जुलाई को यह फिल्म ZEE5 पर रिलीज़ हुई। उस समय लोगों को लगा कि अब फिल्म से जुड़ा विवाद खत्म हो गया है। लेकिन हुआ इसका उल्टा। रिलीज़ के दो दिन बाद ही ZEE5 ने भारत में फिल्म को देखना बंद कर दिया। ZEE5 ने कहा कि "मौजूदा परिस्थितियों" को देखते हुए यह फैसला लिया गया है और कंपनी कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। बाद में सरकारी सूत्रों ने बताया कि केंद्र सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए फिल्म को हटाने के लिए कहा था।
क्या है फिल्म की कहानी
जसवंत सिंह खालरा एक ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट थे, जिन्होंने 90 के दशक में में पंजाब में फेक एनकाउंटर और गुपचुप तरीके से लावारिश लाशों के अंतिम संस्कार का पर्दाफाश किया था, जब पंजाब में मिलिटेंसी चरम पर था। उन्होंने 22 हजार युवा सिखों के लिए आवाज उठाई और हजारों लावारिस लाशों को गुपचुप जलाए जाने के धंधे का खुलासा किया था। इसके लिए उन्होंने राज्य के कई श्मशान घाट जाकर जांच-पड़ताल की थी और आंकड़े जुटाए थे। पुलिस ने उन्हें किडनैप करके उनका फेक एनकाउंटर कर दिया था। 6 सितंबर 1995 को पुलिस खालरा को उनके घर से उठाकर ले गई और मारकर लाश नदी में फेंक दी थी। मामले की सीबीआई जांच की गई , जिसके बाद चार पुलिस अफसरों को उम्रकैद की सजा, और बाकी आरोपियों को सात-सात साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।
ओटीटी पर सेंसर की तैयारी
केंद्र सरकारओटीटी प्लेटफॉर्म पर सीधे रिलीज होने वाली फिल्मों के लिए भी सीबीएफसी प्रमाणन अनिवार्य करने पर विचार कर रही है। फिलहाल यह नियम केवल सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों पर लागू है। प्रस्ताव लागू होने पर ओटीटी फिल्मों की रिलीज से पहले भी सेंसर प्रमाणपत्र लेना पड़ सकता है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह व्यवस्था केवल फिल्मों तक सीमित रहेगी या वेब सीरीज और डॉक्यूमेंट्री पर भी लागू होगी।
शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिक्रिया
पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले फिल्म हटाने के फैसले पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस समेत कई दलों ने विरोध जताया। दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि "सतलुज" के साथ भी वही हुआ जो जसवंत सिंह खालड़ा के साथ हुआ था। पूर्व मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने ZEE5 के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि पंजाब के इतिहास और खालड़ा के बलिदान को दिखाने वाली फिल्म को इस तरह नहीं रोका जाना चाहिए। ZEE5 ने कहा कि फिल्म को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही थी, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों के कारण इसे भारत में अस्थायी रूप से हटाया गया है। कंपनी ने कानूनी माध्यमों से इसे दोबारा उपलब्ध कराने की बात भी कही।