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तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी से पहले ही मचा सियासी बवाल

TCN Desk TCN Desk | 15 Jul, 2026 · 3 min read
तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी से पहले ही मचा सियासी बवाल

बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी की योजना ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

करीब दो दशक बाद बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी की योजना ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उनकी यात्रा को लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) आमने-सामने आ गई हैं।

तस्लीमा नसरीन 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित एक कट्टरपंथ-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी। इस कार्यक्रम में उनके कविता पाठ करने की भी उम्मीद है। इसकी जानकारी उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर दी है।

धर्मनिरपेक्ष संगठनों की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक भावनाओं को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। कार्यक्रम की घोषणा के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं।

टीएमसी विधायक अखरुज्जमां ने समाचार एजेंसी IANS से कहा,

तस्लीमा नसरीन बांग्लादेश की लेखिका हैं। उन्होंने मुस्लिम समुदाय और इस्लाम में शरीयत के खिलाफ काफी कुछ लिखा है। अगर कोई मुसलमानों के खिलाफ बोलता है तो डबल इंजन सरकार उसका सम्मान करेगी, इसमें हैरानी की क्या बात है?


वहीं, BJP ने तस्लीमा नसरीन की वापसी को पश्चिम बंगाल में बदले हुए राजनीतिक माहौल का संकेत बताया। राज्य मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि

पिछली सरकारें तस्लीमा नसरीन को सुरक्षा देने में विफल रहीं। उन्होंने कहा, "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास और सबकी जवाबदेही। अब जवाबदेही तय हो रही है। वामपंथी सरकार तस्लीमा नसरीन जैसी प्रतिभाशाली लेखिका को सुरक्षा नहीं दे सकी। उन्होंने मुसलमानों की राजनीति तो की, लेकिन उन्हें सुरक्षा नहीं दी। ममता बनर्जी के शासनकाल की बात तो छोड़ ही दीजिए। मैंने सुना है कि 1 अगस्त को तस्लीमा जी आ रही हैं। मैं उनकी किताबों की बड़ी प्रशंसक हूं।"


तस्लीमा नसरीन 1990 के दशक की शुरुआत में अपनी नारीवादी लेखनी और धार्मिक कट्टरपंथ की आलोचना के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं। 1994 में उनका उपन्यास 'लज्जा' प्रकाशित हुआ। इस किताब में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों का ज़िक्र किया गया था। किताब के बाद उनके खिलाफ कई फतवे जारी हुए और उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। यूरोप और अमेरिका में कई साल रहने के बाद वह 2004 में भारत आईं और कोलकाता में बस गईं। उन्होंने इस शहर को निर्वासन के दौरान अपना सबसे करीबी सांस्कृतिक घर बताया था। लेकिन नवंबर 2007 में उनकी आत्मकथा 'द्विखंडिता' के कुछ हिस्सों का विरोध शुरू हो गया। मुस्लिम संगठनों के कुछ वर्गों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किए, जो कोलकाता के कई इलाकों में हिंसक हो गए। हालात पर काबू पाने के लिए सेना बुलानी पड़ी।

इसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने तस्लीमा नसरीन से कोलकाता छोड़ने को कहा। उन्हें पहले जयपुर और फिर दिल्ली भेजा गया, जहां शुरुआती समय में उन्हें नज़रबंद रखा गया। बाद में केंद्र सरकार ने उन्हें भारत में लंबे समय तक रहने की अनुमति (रेसिडेंस परमिट) और मल्टीपल-एंट्री वीज़ा दे दिया।