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भीख नहीं, हक मांग रहे हैं हम ... देशभर में स्कूली बच्चे कर रहे विरोध- प्रदर्शन

TCN News Desk TCN News Desk | 1h ago
भीख नहीं, हक मांग रहे हैं हम ... देशभर में स्कूली बच्चे कर रहे विरोध- प्रदर्शन

राजस्थान के जालौर जिले के एक सरकारी स्कूल में छात्राओं ने शिक्षकों की कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

अब राजस्थान के जालौर जिले के एक सरकारी स्कूल में छात्राओं ने शिक्षकों की भारी कमी के खिलाफ स्कूल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। राजस्थान के इस सरकारी स्कूल में छात्राओं ने शिक्षकों की कमी के विरोध में स्कूल के मुख्य गेट पर ताला लगा दिया। स्कूल में कक्षा 1 से 12 तक के 150 से अधिक छात्र पढ़ते हैं, लेकिन वहां केवल एक नियमित शिक्षक तैनात था।


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ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इस समस्या की जानकारी कई बार शिक्षा विभाग को दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। रिपोर्टों के अनुसार, राजस्थान के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के 1.5 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं। वहीं, पूरे देश में अब भी एक लाख से अधिक सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक ही शिक्षक के भरोसे पढ़ाई चल रही है। छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने स्कूल में दो शिक्षकों की तैनाती कर दी और आश्वासन दिया कि जल्द ही और नियुक्तियां की जाएंगी। शिक्षा मंत्रालय के मानकों के अनुसार, स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात (Student-Teacher Ratio) लगभग 30:1 होना चाहिए।

उसी तरह बिहार के गया जिले के टिकारी में एक सरकारी स्कूल के छात्रों ने स्कूल में टूटे पंखे, खराब डेस्क-बेंच को लेकर विरोध किया। स्कूल की खराब व्यवस्था से नाराज छात्रों ने शिक्षा विभाग के जूनियर अधिकारियों से बात करने से मना कर दिया और जिलाधिकारी (डीएम) से सीधे आने की मांग की।


छोटे बच्चों ने टूटे पंखे, खराब बेंच और खराब हैंडपंप जैसी जरूरी सुविधाओं के साथ-साथ मिड-डे मील और टॉयलेट की शिकायतों को लेकर विरोध किया। जब शुरू में एक जूनियर कर्मचारी को स्थिति संभालने के लिए भेजा गया, तो बच्चे अपनी बात पर अड़े रहे और जोर देकर कहा, “हम लोगों को डीएम से बात करनी है। बाद में गया के डीएम ने खुद स्कूल का दौरा किया और नाराज छात्रों से सीधे बात की। डीएम ने कुछ दिनों में शिकायतों को दूर करने के लिए प्रखंड विकास अधिकारी और एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट वाली एक जांच टीम फौरी तौर पर तत्काल बनाई।

बता दें कि कुछ जिन पहले ही छात्रों की नई पीढ़ी जेन अल्फा के प्रदर्शन से न सिर्फ उत्तर प्रदेश की सरकार घबरा गई बल्कि इनकी मांगो को भी तुरंत मान लिया गया था। जेन अल्फा यानी 2013 से 2020 के दशक के बीच पैदा हुए बच्चों का फतेहपुर जिले के एक सरकारी इंटर कॉलेज में किया गया विरोध प्रदर्शन सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। यह विरोध प्रदर्शन किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में हुआ, जहाँ छात्र बिजली, साफ पीने का पानी, क्लासरूम में हवा-पानी की सही व्यवस्था और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर स्कूल के बाहर जमा हुए थे और प्रदर्शन कर रहे थे।

वायरल हो रहे वीडियो में छात्रों का आरोप है कि क्लासरूम में पंखे ठीक नहीं है और बिजली की सप्लाई भी नहीं है। छात्रों को पीने के लिए साफ पानी की भी व्यवस्था नहीं है। कुछ छात्रों ने स्कूल के टॉयलेट की हालत और प्रिंसिपल के गलत व्यवहार की भी शिकायत की। इन दावों को सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया है, लेकिन इनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

जिस बात ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा, वह था विरोध प्रदर्शन का तरीका। सिर्फ हाथ से लिखे नारों के बजाय, कई छात्रों ने अपनी मांगों वाले पोस्टर और प्लेकार्ड डिजाइन करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स का इस्तेमाल किया। बच्चों के हाथों में जो बैनर था उस पर साफ लिखा था कि

‘कॉलेज की व्यवस्था सुधारो, बच्चों का भविष्य सवारों।’ नाराज छात्रों ने यहां तक कहा कि 'सर्वोदय इंटर कॉलेज' के प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन्हें फेल करने की धमकी भी दी जाती है। प्रिंसिपल छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

डिजिटल टूल्स और प्रदर्शन के इस मेल ने तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने इसे उत्तर प्रदेश में "पहला जेन-अल्फा आंदोलन" बताया। यही कारण है कि इस प्रदर्शन का तुरंत असर हुआ। शिक्षा अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल (DIOS) राकेश कुमारने छात्रों की मुख्य मांगों को मानते हुए लिखित आश्वासन दिया। शिक्षा अधिकारी ने कहा कि,

हर क्लासरूम में चार सीलिंग फ़ैन लगाए जाएंगे, खराब बिजली की वायरिंग ठीक की जाएगी, एक महीने के भीतर डेस्क और बेंच उपलब्ध कराए जाएंगे, और स्कूल परिसर में RO वॉटर कूलर लगाया जाएगा।

बता दें कि छात्र -छात्राओं ने स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षा अधिकारियों को तीन दिन का अल्टीमेटम दिया था। जिसके बाद बीएसए के घेराव की चेतावनी भी दी थी। लेकिन मामला बढ़ता देख अधिकारियों ने जल्द से व्यवस्थाएं सुधारने की हामी भरी।

इस घटना ने सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर बहस छेड़ दी है, न सिर्फ़ इसलिए कि प्रदर्शनकारी स्कूली बच्चे थे, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने जो मुद्दे उठाए थे। कई लोगों ने गौर किया कि मांगें व्यापक राजनीतिक या वैचारिक चिंताओं के बजाय बुनियादी शैक्षिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित थीं। कई लोगों ने सवाल उठाया कि ऐसी ज़रूरी सुविधाओं के लिए कार्रवाई होने से पहले सार्वजनिक विरोध की ज़रूरत क्यों पड़ी।

तत्काल नतीजों से परे, यह घटना युवा पीढ़ियों के बीच नागरिक भागीदारी के बदलते पैटर्न को दिखाती है। जहां 'जेन-जी' तेज़ी से रोज़गार, परीक्षाओं और सार्वजनिक नीति के मुद्दों पर एकजुट हो रही है, वहीं फतेहपुर का विरोध प्रदर्शन बताता है कि 'जेन-अल्फा' के छात्र कम उम्र में ही संस्थागत जवाबदेही के प्रति जागरूक हो रहे हैं और बदलाव के लिए शांतिपूर्ण सामूहिक कार्रवाई के साथ-साथ डिजिटल तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। AI से बने पोस्टर्स का उनका इस्तेमाल यह भी दिखाता है कि कैसे नई तकनीकें स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच नागरिक भागीदारी को आकार दे रही हैं।

हालांकि इस विरोध का लंबे समय में क्या असर होगा, यह देखना अभी बाकी है, लेकिन शिक्षा अधिकारियों की ओर से किए गए लिखित वादों पर अब बारीकी से नज़र रखी जाएगी। वादे के मुताबिक सुधार समय पर लागू होते हैं या नहीं, इससे यह तय हो सकता है कि क्या यह वायरल घटना सिर्फ़ एक बार की कामयाबी की कहानी बनकर रह जाएगी या फिर यह इस बात का उदाहरण बनेगी कि कैसे डिजिटल दौर में छात्रों की सक्रियता ज़मीनी स्तर पर शासन-व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।