ईरान की बहादुर औरतों के नाम एक खत
दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ सुजाता की चिट्ठी ईरान की औरतों के नाम
प्रिय ईरानी बहनो,
यह समय आपके लिए बेहद कठिनाई और अनिश्चितता से भरा हुआ है। दुनिया भर में आपकी परिस्थितियों को लेकर प्रतिक्रियाएँ बंटी हुई हैं। कुछ आवाज़ें आपके प्रति सहानुभूति व्यक्त कर रही हैं, जबकि कुछ अन्य, चिंताजनक रूप से, आज़ादी के नाम पर हिंसा का उत्सव मना रही हैं। मिनाब में निर्दोष स्कूली बच्चों की हत्या और किसी राष्ट्र की संप्रभुता का उल्लंघन मुक्ति के कार्य नहीं हैं; वे आतंक के कार्य हैं। कोई भी तर्क, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, किसी देश पर बमबारी को नैतिक नहीं बना सकता। हम, भारत की स्त्रियाँ, ऐसे कृत्य को न तो स्वीकार्य मानते हैं और न ही उनका समर्थन कर सकते हैं।
हमारा दृष्टिकोण इतिहास से निर्मित हुआ है। एक लंबे, पीड़ादायक और शिक्षाप्रद इतिहास से। भारत ने दो शताब्दियों से अधिक समय तक औपनिवेशिक शासन सहा, जिसने हमारी सामूहिक चेतना पर गहरे घाव छोड़े। उस अनुभव ने हमें एक मूलभूत सत्य सिखाया: स्वतंत्रता किसी कब्ज़ा करने वाली शक्ति द्वारा प्रदान नहीं की जा सकती। वह उन लोगों का उपहार नहीं हो सकती जो हथियार लेकर आते हैं, मुक्ति का दावा करते हुए संसाधनों का दोहन करते हैं, संस्थाओं को नष्ट करते हैं और अपनी इच्छा थोपते हैं। जब कोई आक्रमणकारी मुक्ति की भाषा बोलता है, तो वह भाषा अक्सर न्याय या मानवता से कहीं अधिक छिपे हुए उद्देश्यों को प्रकट करती है।
सन् 2026 में यह विश्वास करना मुश्किल है कि दुनिया अब भी इस विचार को स्वीकार करती है कि शक्तिशाली राष्ट्र किसी दूसरे देश के नागरिकों को "मुक्त" करने के लिए सैन्य हस्तक्षेप करते हैं। इतिहास हमें पर्याप्त सबक दे चुका है कि हम भाषण और वास्तविकता के बीच के विरोधाभास को पहचान सकें। लोकतंत्र, मानवाधिकार और मुक्ति जैसे शब्द नैतिक महत्व रखते हैं, लेकिन इन्हें हथियार की तरह इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इन शब्दों के पीछे अक्सर जियोपोलिटिकल महत्वाकांक्षाएँ, आर्थिक हित और रणनीतिक गणनाएँ छिपी होती हैं, जिनका आम लोगों के हित से बहुत कम संबंध होता है।
जब आपने अपने ही सिस्टम के भीतर मौजूद अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाई, तब हममें से अनेक ने आपके साथ एकजुटता व्यक्त की थी। आपके साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प ने सीमाओं के पार महिलाओं को प्रेरित किया। और आज, जब आपका राष्ट्र स्वयं संकट का सामना कर रहा है, तब भी हमारी यह एकजुटता अडिग है। हम आपके साथ हैं। सिर्फ़ किसी अंधनिष्ठा से साथ नहीं, बल्कि गरिमा, स्वायत्तता और आत्मनिर्णय के अधिकार की साझा समझ के कारण साथ हैं।
हर औरत को, चाहे उसका जन्म कहीं भी हुआ हो, अपने घर, अपनी भूमि और अपने लोगों की रक्षा करने का अधिकार है।
लंबे समय तक मुझे वर्जीनिया वूल्फ़ के प्रसिद्ध कथन में सांत्वना और प्रेरणा मिलती रही, जो उन्होंने अपनी पुस्तक Three Guineasमें लिखा था "एक स्त्री होने के नाते मेरा कोई देश नहीं है।" यह एक ऐसा विचार था, जो सीमाओं से परे जाकर उन संरचनाओं को चुनौती देता था जो अक्सर महिलाओं को हाशिए पर रखती हैं। लेकिन आज, बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच, यह कथन पहले से कहीं ज़्यादा उलझा हुआ प्रतीत होता है। संसार जैसे आज अस्थिर और उलट-पुलट हो गया है, उसने हममें से अनेक को उन सत्यों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया है जिन्हें हमने कभी निर्विवाद माना था।
भारत के विभाजन का इतिहास हमें याद दिलाता है कि महिलाओं और राष्ट्र का संबंध न तो अमूर्त है और न ही वैकल्पिक। उस त्रासदी के दौरान करोड़ों लोग विस्थापित हुए और महिलाओं ने सबसे गहरे घाव सहे। उन्हें अपनी जड़ों से उखाड़ दिया गया, सीमाओं के पार जाने के लिए मजबूर किया गया और ऐसी हिंसा का सामना करना पड़ा जिसने उन्हें सांप्रदायिक पहचान के प्रतीक के रूप में चिह्नित करने की कोशिश की। भारत और पाकिस्तान द्वारा चलाए गए पुनर्वास अभियानों में अनेक महिलाओं को उनके तथाकथित "राष्ट्रीय घर" भेजा गया, कई बार उनकी इच्छा के विरुद्ध। उन क्षणों में यह अत्यंत स्पष्ट हो गया कि औरत का वास्तव में एक देश होता है, एक ऐसा देश जो उस पर दावा कर सकता है, उसकी पहचान तय कर सकता है और यहाँ तक कि उसके भाग्य का निर्णय भी कर सकता है।
एक भारतीय महिला के रूप में मैं इस सत्य की अनदेखी नहीं कर सकती कि किसी राष्ट्र से जुड़ाव का क्या अर्थ होता है! राष्ट्र भी एक ऐसा राष्ट्र जो अपूर्ण है, निरंतर विकसित हो रहा है, कभी-कभी अपने ही लोगों के साथ न्याय करने में असफल रहता है, फिर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हमारा इतिहास उन महिलाओं की कहानियों से भरा है जिन्होंने राष्ट्र की अवधारणा से ख़ुद को अलग नहीं किया, बल्कि उसे बेहतर बनाने के लिए संघर्ष किया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हजारों महिलाओं ने आगे बढ़कर भाग लिया और भारी व्यक्तिगत मूल्य चुकाया। केवल महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलनों में ही लगभग 30,000 महिलाओं ने भाग लिया और कारावास सहा। उनका साहस केवल प्रतीकात्मक नहीं था; सक्रिय, सजीव और परिवर्तनकारी था।
जब 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और औपनिवेशिक सरकार ने अधिकांश प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, तब अरुणा आसफ़ अली जैसी महिलाओं ने प्रतिरोध की भावना को जीवित रखा। भूमिगत रहकर उन्होंने और उनकी अनेक साथियों ने यह सुनिश्चित किया कि दमन के बावजूद आंदोलन समाप्त न हो। ये केवल कुछ अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि उस व्यापक ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा हैं जिसमें महिलाओं ने अपने देश की गरिमा और स्वायत्तता की रक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाई।
इसी ऐतिहासिक चेतना से प्रेरित होकर हम आज आपसे संवाद कर रहे हैं। हम शायद दूसरों की तुलना में अधिक गहराई से समझते हैं कि बाहरी और भीतरी, दोनों तरह के दमन के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का क्या अर्थ होता है। इसलिए इस कठिन घड़ी में हम पूरे मन से अपना नैतिक समर्थन आपके साथ व्यक्त करते हैं। हम आपकी आवाज़ सुन रहे हैं, तब भी जब अन्य लोग उसे दबाने की कोशिश कर रहे हैं या आपकी लड़ाई को अपनी वैचारिक दृष्टि से परिभाषित करने का प्रयास कर रहे हैं।
आज वैश्विक विमर्श में जिस प्रकार स्त्रीवाद की भाषा का उपयोग किया जा रहा है, उसमें कुछ अत्यंत चिंताजनक बातें हैं। कुछ स्थानों पर युद्ध की वास्तविकताओं को उचित ठहराने या उन्हें कम गंभीर दिखाने के लिए स्त्रीवाद का सहारा लिया जा रहा है। उसे किसी राष्ट्र की पीड़ा को उसकी महिलाओं की मुक्ति की आवश्यक कीमत के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे कुछ गहरे और असुविधाजनक प्रश्न जन्म लेते हैं। क्या घरों की बर्बादी, मौत का तांडव और राष्ट्रीय संप्रभुता का क्षरण कभी महिलाओं की स्वतंत्रता के आदर्शों के साथ मेल खा सकते हैं? क्या हिंसा वास्तव में मुक्ति का वैध मार्ग हो सकती है?
हमें स्वयं से पूछना होगा कि आज़ादी वास्तव में क्या है? महिलाओं के लिए स्वतंत्रता कैसी दिखती है, और उसकी परिभाषा तय करने का अधिकार किसके पास है? क्या यह शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा निर्धारित कोई सार्वभौमिक रूपरेखा है, या फिर यह स्वयं महिलाओं के अनुभवों, संस्कृतियों और आकांक्षाओं से जन्म लेने वाली अवधारणा है? ये केवल आलंकारिक प्रश्न नहीं हैं; ये सभी समकालीन स्त्रीवादी विमर्श के केंद्र में स्थित प्रश्न हैं।
आज स्वतंत्रता को कुछ सीमित मानकों से जोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिनकी जड़ें प्रायः पश्चिमी विचारधाराओं में हैं। किसी विशेष प्रकार के वस्त्र पहनने का अधिकार, चुनावी प्रक्रियाओं में भाग लेने की क्षमता, या कुछ सामाजिक मानदंडों को अपनाने को मुक्ति के अंतिम प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। निस्संदेह ये अधिकार महत्वपूर्ण हैं लेकिन स्वतंत्रता की संपूर्ण परिभाषा नहीं हैं क्योंकि ये अधिकार ऐसे तंत्र के साथ भी सह-अस्तित्व में रह सकते हैं जो बेहद अन्यायपूर्ण या दमनकारी हों।
यदि स्वतंत्रता का अर्थ विकल्प चुनने की क्षमता है, तो हमें उन संरचनाओं की भी समीक्षा करनी होगी जिनके भीतर ये विकल्प निर्मित होते हैं। क्या उन व्यवस्थाओं में भाग लेना स्वतंत्रता है जो असमानता, शोषण या अन्याय को बनाए रखती हैं? क्या वह स्वतंत्रता है यदि उपलब्ध विकल्प स्वयं बाहरी दबावों, आर्थिक निर्भरताओं या सांस्कृतिक विलोपन से सीमित हों? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी बाहरी शक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह दूसरों पर अपनी स्वतंत्रता की परिभाषा थोपे?
ये प्रश्न विशेष रूप से तब प्रासंगिक हो जाते हैं जब हम संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों की भूमिका पर विचार करते हैं, जो लोकतंत्र और महिलाओं के अधिकारों के वैश्विक विमर्श को आकार देने का दावा करते हैं। ये देश स्वयं को स्वतंत्रता के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करते हैं लेकिन उनके कार्य हमेशा उनके कथनों से मेल नहीं खाते। यह विरोधाभास नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता बल्कि गंभीर समीक्षा की माँग करता है। अफ़ग़ानिस्तान का हालिया इतिहास इसका स्पष्ट उदाहरण है। दशकों तक चले हस्तक्षेप, कब्ज़े और अंततः वापसी ने वहाँ के लोगों, विशेषकर महिलाओं को स्थायी स्वतंत्रता या स्थिरता नहीं दी। इसकी बजाय वह एक बिखरा हुआ समाज छोड़ गया, जहाँ मुक्ति के वादे खोखले साबित हुए।
हम, जिन्हें ग्लोबल साउथ कहा गया और जिन्हें पश्चिमी चिंतन में अक्सर "ओरिएंट" कहा गया है, उनके लिए चुनौती केवल बाहरी प्रभुत्व का प्रतिरोध करने की नहीं है। चुनौती उन बौद्धिक ढाँचों की भी आलोचनात्मक समीक्षा करने की है जिनके ज़रिए हमारे संघर्षों को समझा और प्रस्तुत किया जाता है। स्त्रीवाद अगर सच में एक वैश्विक आंदोलन है, तो वह किसी एक संस्कृति या विचारधारा तक सीमित नहीं रह सकता। उसे विविध आवाज़ों, इतिहासों और अनुभवों को अपने भीतर समाहित करना होगा।
अब समय आ गया है कि हम स्वयं स्त्रीवाद को भी उपनिवेशवादी मानसिकता से मुक्त करें। इसका अर्थ समानता और न्याय के उन मूल सिद्धांतों को अस्वीकार करना नहीं है जिन पर स्त्रीवाद आधारित है, बल्कि उसके दायरे का विस्तार करना है और उसका समावेशीकरण करना है। इसका अर्थ यह स्वीकार करना है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों की महिलाएँ स्वतंत्रता को अलग-अलग तरीकों से परिभाषित कर सकती हैं, और उनकी ये परिभाषाएँ भी उतनी ही वैध हैं।
प्रिय बहनो, आपका संघर्ष जटिल है, बहुआयामी है और उसकी अपनी ऐतिहासिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ हैं। इसे किसी सरल सी बाइनरी में नहीं बाँधा जा सकता और न ही भू-राजनीतिक एजेंडों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इन चुनौतीपूर्ण समयों में यह जानिए कि दुनिया भर में ऐसी महिलाएँ हैं जो आपको देखती हैं, आपकी स्वायत्तता का सम्मान करती हैं और आपके साथ खड़ी हैं। उद्धारक या रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि सहयोगी के रूप में।
एकजुटता और उम्मीद के साथ,
हम आपके साथ हैं।
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यह लेख अंग्रेजी में The Wire में प्रकाशित हुआ था, यहाँ लेखिका की अनुमति से प्रकाशित किया जा रहा है।
कवर फ़ोटो ह्यूमन राइट वाच से साभार
Sujata
डॉ सुजाता दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, लेखिका और स्तंभकार हैं। समाज, स्त्री-अधिकार, लैंगिक समानता, साहित्य और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी लेखनी अपनी बेबाक दृष्टि और संवेदनशील विश्लेषण के लिए जानी जाती है