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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशन बंद, अवमानना याचिका दायर

TCN Desk TCN Desk | 42m ago · 4 min read
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशन बंद, अवमानना याचिका दायर

याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन और अन्य अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया गया है।

सीजेपी के प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली में मेट्रो सेवाओं और राजधानी आने वाली रेलगाड़ियों पर पाबंदियों को लेकर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की गई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों ने अदालत के उस निर्देश का पालन नहीं किया, जिसमें 10 अक्टूबर को सार्वजनिक परिवहन की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगाने से मना किया गया था।

Bar and Bench की एक रिपोर्ट के अनुसार, शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन और अन्य अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में मेट्रो स्टेशन बंद रहे। याचिका के मुताबिक, इन पाबंदियों से सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ और लोगों को आवाजाही में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।

यह मामला कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन से जुड़ा है। पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। इसके मद्देनजर सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और दिल्ली आने वाली रेलगाड़ियों को रद्द करने जैसे कदम उठाए गए थे।


अवमानना याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का उल्लेख किया गया है। यह आदेश एक अलग याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया था, जिसमें प्रदर्शन के चलते 57 मेट्रो स्टेशन बंद करने और दिल्ली आने वाली रेलगाड़ियां रद्द करने को चुनौती दी गई थी। अदालत ने सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगाने को लेकर चिंता जताई थी। शुक्रवार को मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की थी।

पीठ ने केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि 10 अक्टूबर को मेट्रो सेवाओं और दिल्ली आने वाली रेलगाड़ियों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध न लगाया जाए। अदालत ने कहा था कि हर चीज को पूरी तरह ठप नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को भी स्वीकार किया था। अदालत ने कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अनियंत्रित आवाजाही रोकने के लिए कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन ऐसे उपायों के कारण आम नागरिकों को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाना चाहिए। सुरक्षा व्यवस्था के साथ लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

अपने आदेश में अदालत ने कहा था कि संबंधित अधिसूचनाएं जरूरत से ज्यादा व्यापक प्रतीत होती हैं, क्योंकि वे आवश्यक सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाती हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि मेट्रो और अन्य रेल सेवाओं की आवाजाही को पूरी तरह प्रतिबंधित करने तथा उसे नियंत्रित तरीके से संचालित करने के बीच अंतर है। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते कहा था कि मक्खी को मारने के लिए हथौड़ा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत के इस रुख के बाद भारत के सॉलिसिटर जनरल ने अधिकारियों से इन पाबंदियों का दोबारा आकलन करने के लिए कहने पर सहमति जताई थी। इसी आश्वासन के संदर्भ में पीठ ने स्पष्ट किया कि मेट्रो रेलगाड़ियों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। हालांकि, परिस्थितियों को देखते हुए मेट्रो और दूसरी रेल सेवाओं को उपयुक्त तथा नियंत्रित तरीके से चलाने का विवेकपूर्ण फैसला लिया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि परिवहन सेवाओं के संचालन से संबंधित निर्णय का व्यापक प्रचार किया जाए, ताकि लोगों को और असुविधा न हो। अदालत ने वाहनों की सुचारु आवाजाही सुनिश्चित करने और जनता की परेशानियां कम करने के लिए यातायात संबंधी परामर्श समाचारपत्रों तथा ऑनलाइन मंचों पर प्रकाशित करने का निर्देश भी दिया था।

हालांकि, दिल्ली मेट्रो ने बताया कि सुरक्षा कारणों से 45 स्टेशन शुक्रवार रात 9 बजे से शनिवार शाम 6 बजे तक बंद रहेंगे। नई याचिका में इसी स्थिति को अदालत के निर्देशों के कथित उल्लंघन के रूप में उठाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आदेश के बावजूद स्टेशनों को बंद रखने से सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर लोगों की मुश्किलें बनी रहीं।

अब अवमानना याचिका में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका का आधार यह आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित तरीके से चालू रखने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं हुआ। अदालत ने अपने आदेश में पूर्ण रोक के बजाय परिस्थितियों के अनुरूप सेवाओं के संचालन और उसके बारे में जनता को पर्याप्त जानकारी देने पर जोर दिया था।