असम में हाई कोर्ट से राहत के बाद भी महिला को बांग्लादेश भेज दिया गया
असम की मुमताज बेगम को गुवाहाटी हाई कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद उन्हें फ़ॉरेन ट्रिब्यूनल से सीधे गिरफ्तार कर हिरासत में लिया गया और बाद में बांग्लादेश भेज दिया गया।
असम की 44 वर्षीय मुमताज बेगम का मामला इन दिनों फिर चर्चा में है। परिवार और वकीलों का आरोप है कि गुवाहाटी हाई कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद उन्हें फ़ॉरेन ट्रिब्यूनल से सीधे गिरफ्तार कर हिरासत में लिया गया और बाद में बिना हाई कोर्ट की अनुमति के बांग्लादेश भेज दिया गया।
Scroll की रिपोर्ट के अनुसार, मुमताज बेगम को 2019 में नागांव फ़ॉरेन ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित कर दिया था। हालांकि अप्रैल 2026 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने यह फैसला रद्द करते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल ने उनके कई महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार ही नहीं किया। हाई कोर्ट ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस ट्रिब्यूनल भेज दिया। 30 मई को जब बेगम दोबारा ट्रिब्यूनल में पेश हुईं, तो उनके वकीलों के मुताबिक कुछ ही मिनटों में ट्रिब्यूनल सदस्य ने पुलिस बुलाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आरोप है कि गिरफ्तारी का कोई अलग आदेश नहीं दिया गया और उन्हें पहले नागांव पुलिस, फिर गोलपारा के मटिया डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया। एक सप्ताह बाद परिवार को पता चला कि वह वहां भी नहीं हैं। बाद में हाई कोर्ट में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के दौरान सरकार ने बताया कि उन्हें पहले ही बांग्लादेश भेजा जा चुका है।
बेगम की ओर से पेश वकील एच.आर.ए. चौधरी और संजय हेगड़े का कहना है कि,
जब हाई कोर्ट ने मामला पुनर्विचार के लिए भेज दिया था, तब उनकी नागरिकता का प्रश्न अंतिम रूप से तय नहीं हुआ था। ऐसे में फ़ॉरेन ट्रिब्यूनल के पास उनकी गिरफ्तारी या हिरासत का आदेश देने का अधिकार नहीं था।
मुमताज बेगम की नागरिकता पर विवाद 1997 से चल रहा है, जब उन्हें "डी-वोटर" (संदिग्ध मतदाता) घोषित किया गया था। 2017 में उन्हें भारतीय नागरिक माना गया, लेकिन बाद में उस फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठने के बाद हाई कोर्ट ने 188 मामलों की दोबारा सुनवाई का आदेश दिया। पुनः सुनवाई में 2019 में उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया, जिसे अप्रैल 2026 में हाई कोर्ट ने फिर रद्द कर दिया।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि न्यायाधिकरण ने बेगम द्वारा पेश किए गए कई अहम दस्तावेज—जैसे मतदाता सूची, भूमि अभिलेख, स्कूल प्रमाणपत्र और पारिवारिक रिकॉर्ड का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि फ़ॉरेन ट्रिब्यूनल के सदस्यों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके बावजूद, 30 मई के नए आदेश में फ़ॉरेन ट्रिब्यूनल ने उन्हीं दस्तावेजों की पर्याप्त समीक्षा किए बिना बेगम को फिर विदेशी घोषित कर दिया। 19 जून को हाई कोर्ट ने अधिकारियों से उनके ठिकाने की जानकारी मांगी और बिना अदालत की अनुमति निर्वासन पर रोक लगाई थी। लेकिन छह दिन बाद राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि बेगम को पहले ही बांग्लादेश भेजा जा चुका है।