जंतर-मंतर के पास केरल के पूर्व सीएम पिनरायी विजयन हिरासत में, स्टालिन बोले—इमरजेंसी की याद दिला रहे हैं
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पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार अब यह तय करना चाहती है कि दिल्ली में कौन प्रवेश कर सकता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आह्वान पर आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान कई वरिष्ठ वाम नेताओं को हिरासत में लिए जाने का मामला सामने आया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा ने कहा है कि दिल्ली पुलिस ने राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन और राज्य के पूर्व मंत्री के. एन. बालगोपाल को हिरासत में लिया। पार्टी के मुताबिक, इन नेताओं को शहर में घुमाने के बाद छत्रसाल स्टेडियम लाया गया।
राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित इस प्रदर्शन को वाम दलों ने भी समर्थन दिया था। दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर और उसके आसपास कड़े प्रतिबंध लागू किए हैं। प्रदर्शनकारियों को जिन स्थानों पर ले जाया जा रहा है, उनमें छत्रसाल स्टेडियम भी शामिल है। माकपा ने अपने नेताओं को हिरासत में लिए जाने पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की और इसे लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार पर हमला बताया।
माकपा की केरल इकाई ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेता एम. ए. बेबी, बृंदा करात, ई. पी. जयराजन, एम. वी. गोविंदन, के. के. शैलजा और पी. के. श्रीमती को भी हिरासत में लिया गया है। पार्टी ने इन कार्रवाइयों को चुनाव आयोग के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन में नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी रोकने से जोड़ा।
अपने बयान में माकपा ने सीजेपी नेताओं और यूट्यूबर ध्रुव राठी के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया। पार्टी ने लिखा कि सीजेपी नेता अभिजीत दीपके को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया। ध्रुव राठी को गुरुग्राम में और सीजेपी नेता सौरव दास को दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया।
माकपा ने सवाल उठाया,
“इनका ‘अपराध’ क्या है? चुनाव आयोग के खिलाफ एक लोकतांत्रिक प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आना।” पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार अब यह तय करना चाहती है कि दिल्ली में कौन प्रवेश कर सकता है, कौन विरोध प्रदर्शन कर सकता है और कौन ज्ञानेश कुमार से सवाल पूछ सकता है।
पार्टी ने कहा कि चुनाव आयोग का बचाव करने के नाम पर सरकार ऐसी स्थिति तक पहुंच गई है, जहां विरोध जताने के लिए आने वाले लोगों को रोका जा रहा है। माकपा ने अपने पोस्ट में मांग की, “लोकतंत्र तुरंत बहाल किया जाए। ज्ञानेश कुमार को जाना होगा।” इस तरह पार्टी ने हिरासत में लिए गए नेताओं का मुद्दा उठाने के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी दोहराई।
इस बीच, द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके के अध्यक्ष और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने भी दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने एक्स पर लिखा कि दिल्ली में सामने आ रहे दृश्य और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दमन का स्तर उन्हें उस आपातकाल की दर्दनाक याद दिला रहा है, जिससे वह खुद गुजरे थे।

स्टालिन ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में हिरासत में लिए गए सभी राजनीतिक नेताओं, छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों को तत्काल रिहा करने की मांग की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपना लोकतांत्रिक अधिकार इस्तेमाल करने वाले युवाओं के खिलाफ केंद्र सरकार को अपनी कार्रवाई तुरंत बंद करनी चाहिए।
अपने बयान में स्टालिन ने तमिलनाडु की टीवीके सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार भाजपा के विस्तार की तरह काम कर रही है और विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस दमन कर रही है। स्टालिन ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए छात्रों और युवाओं के विरोध जताने के अधिकार का समर्थन किया।
डीएमके प्रमुख ने कहा,
“असहमति कोई अपराध नहीं है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाने वालों को चुप कराकर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।” उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर जोर देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हो सकता।
स्टालिन ने कहा कि केवल इस्तीफा पर्याप्त नहीं होगा। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग के संस्थागत ढांचे को जो नुकसान पहुंचा है, उसे भी दूर करना होगा और आयोग की स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता बहाल करनी होगी। माकपा और डीएमके के इन बयानों में हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के सवाल प्रमुखता से उठाए गए हैं।
